बुलंदशहर। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में 2018 में हुई हिंसा के मामले में सात साल बाद स्थानीय अदालत ने अपना फैसला सुनाया है। इस घटना में पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह और एक आम नागरिक की मौत हो गई थी। अदालत ने 38 आरोपियों को दोषी करार दिया है जिसमें बजरंग दल के नेता रहे योगेश राज भी शामिल हैं।
मुख्य भूमिका निभाने वाले योगेश राज पर गंभीर आरोप
कोर्ट ने पाया कि योगेश राज ने हिंसा भड़काने और बलवा कराने में मुख्य भूमिका निभाई थी। इसके अलावा, 33 अन्य आरोपियों को हिंसा, आगजनी और भारतीय दंड संहिता की धारा 307 (हत्या का प्रयास) के तहत दोषी ठहराया गया है। इनमें से पांच आरोपियों को इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या के साथ-साथ हिंसा और बलवा के आरोपों में भी दोषी पाया गया है।
राजद्रोह की धारा हटाई गई
हालांकि अदालत ने सभी दोषियों के खिलाफ राजद्रोह (धारा 124ए) की धारा हटा दी है। यह निर्णय राज्य पुलिस द्वारा गृह विभाग की मंजूरी के बिना आरोप पत्र दायर करने के कारण लिया गया। कोर्ट ने पुलिस की इस कार्रवाई पर सख्त टिप्पणी भी की।
घटना का पृष्ठभूमि
3 दिसंबर, 2018 को बुलंदशहर के महाव गांव में कथित गौवंश अवशेष मिलने के बाद हिंसा भड़क गई थी। इस घटना में पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह और एक युवक सुमित की मौत हो गई थी। हिंसा के दौरान भीड़ ने पुलिस पर पथराव किया और आगजनी की घटनाएं हुईं।
अदालत का निर्णय और आगे की कार्रवाई
अदालत ने 1 अगस्त, 2025 को दोषियों की सजा का ऐलान करने की तिथि तय की है। इस फैसले से बुलंदशहर हिंसा मामले में न्याय की लंबी प्रतीक्षा खत्म हुई है, लेकिन यह भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस फैसले से भविष्य में ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगेगा।
बुलंदशहर हिंसा मामले में कोर्ट का फैसला एक महत्वपूर्ण मोड़ है जहां 38 आरोपियों को दोषी ठहराया गया है। हालांकि, राजद्रोह की धारा हटाए जाने से इस मामले में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। अब सभी की निगाहें सजा के ऐलान पर टिकी हैं।



