हेरात। रविवार सुबह-सुबह जो खबर आई, उसने फिर एक बार पूरे अफगानिस्तान को सन्न कर दिया। हेरात-कंधार हाईवे पर दो गाड़ियां आमने-सामने इतनी जोर से टकराईं कि मौके पर ही दस लोगों की जान चली गई। दस से ज्यादा यात्री बुरी तरह जख्मी हैं, उन्हें हेरात के अस्पतालों में भर्ती कराया गया है।
पुलिस वाले बता रहे हैं कि एक कार बहुत तेज थी, सामने से आ रही दूसरी गाड़ी से सीधी भिड़ंत हो गई। टक्कर के बाद दोनों गाड़ियां बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गईं। यह वही हाईवे है जिसे लोग “डेथ रूट” कहते हैं – नाम ही काफी है डराने को।
बस यही एक हादसा नहीं। पिछले एक हफ्ते में तो जैसे मौत सड़कों पर उतर आई हो।
तीन दिन पहले लगमन प्रांत में एक यात्री बस अनियंत्रित होकर खाई में जा गिरी और उसमें आग लग गई। छह लोग जिंदा जल गए, तीन घायल बचे। उससे एक दिन पहले नंगरहार में क्लिनिक की महिला स्टाफ को ले जा रहा वैन तेज रफ्तार कार से टकराया – एक महिला डॉक्टर और एक मासूम बच्चे की मौत। छह महिला कर्मचारी और ड्राइवर गंभीर घायल। उससे दो दिन पहले जाबुल में भी एक हादसा, एक की मौत, दो जख्मी।
मतलब सात दिन में चार बड़े हादसे ओर कम से कम उन्नीस मौतें। और ये सिर्फ वो मामले हैं जो सामने आए। छोटे-मोटे हादसे तो रोज का किस्सा हैं।
लोग पूछ रहे हैं – आखिर कब तक चलेगा यह सिलसिला?
सड़कें जर्जर है ओर कई जगह तो गड्ढों का पूरा समंदर दिखाई पड़ता है। पहाड़ी रास्तों में तीखे मोड़, ब्रेक लगाओ तो भी फिसलन। गाड़ियां जितनी चाहे उतने यात्री ठूंस लो, कोई रोक-टोक नहीं। ड्राइवर ज्यादातर बिना लाइसेंस के, तेज रफ्तार तो जैसे उनका हक है। ट्रैफिक पुलिस का नामोनिशान तक नहीं। ऊपर से सालों से युद्ध ने सड़कों को और बर्बाद कर रखा है।
तालिबान सरकार के प्रवक्ता की तरफ से अभी तक कोई बयान नहीं आया है कि अब क्या करेंगे। मगर जो विशेषज्ञ जानते हैं वो साफ कह रहे हैं – अगर सड़कें नहीं सुधारीं, स्पीड पर लगाम नहीं लगाई, ओवरलोडिंग नहीं रोकी तो यह आंकड़ा और भयानक होता चला जाएगा।
फिलहाल हेरात के अस्पतालों में घायलों की चीखें गूंज रही हैं और श्मशान में दस और चिताएं सुलग रही हैं। सड़क फिर खामोश है। लेकिन कब तक



