भारतीय रुपया 2025 में लगातार दबाव झेल रहा है. खासकर यूरो, ब्रिटिश पाउंड और जापानी येन के मुकाबले इसकी हालत ज्यादा खराब हुई है. ताजा आंकड़ों के अनुसार, रुपया यूरो के खिलाफ 13.6%, पाउंड के खिलाफ 9.3% और येन के खिलाफ 8.4% टूटा है. वहीं, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरावट सिर्फ 2.73% रही है. यह अंतर बताता है कि रुपये की कमजोरी का कारण सिर्फ घरेलू नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक बदलाव भी हैं.
रुपये पर क्यों बढ़ा दबाव?
विदेशी निवेशकों की बिकवाली इस गिरावट की बड़ी वजह है. विशेषज्ञों का कहना है कि विदेशी फंड्स का लगातार बाहर जाना रुपये की मांग को कम कर रहा है. दूसरी ओर, यूरोप की अर्थव्यवस्था ने बेहतर प्रदर्शन किया है, जिससे यूरो और पाउंड मजबूत हुए हैं. इसका असर रुपये पर दोहरा पड़ा है. साथ ही, अमेरिका के भारतीय सामान और सेवाओं पर ऊंचे टैरिफ ने निर्यात को कमजोर किया, जिससे भारत का व्यापार संतुलन बिगड़ा है.
सेफ हेवन का बदलता रुख
वैश्विक अनिश्चितता के बीच निवेशक अब डॉलर की बजाय सोना और डिजिटल एसेट्स को तरजीह दे रहे हैं. इससे डॉलर कमजोर हुआ और यूरो, पाउंड, येन जैसी मुद्राएं मजबूत हुईं. HDFC सिक्योरिटीज के विशेषज्ञ दिलीप के मुताबिक, “विदेशी फंड्स का बहिर्वाह और यूरोप में निवेश का रुझान रुपये को दबाव में ला रहा है. अमेरिकी टैरिफ ने भारतीय निर्यात को कमजोर किया, जिससे रुपये की हालत और बिगड़ी.”
कारोबार और निवेशकों पर असर
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निर्यात-आयात कंपनियां: यूरोप और जापान से कारोबार करने वाली फर्म्स पर सीधा असर पड़ा है.
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आईटी और फार्मा: यूरोप में मजबूत मुद्रा से कुछ फायदा, लेकिन टैरिफ का दबाव बरकरार.
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मैन्युफैक्चरिंग: आयात महंगा होने से लागत बढ़ी, मार्जिन पर दबाव.
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सोना और डिजिटल एसेट्स: वैश्विक रुझान के चलते इनमें निवेश बढ़ा है.
आगे क्या होगा?
रुपये का भविष्य तीन बातों पर टिका है. पहला, RBI और सरकार का हस्तक्षेप कितना प्रभावी रहता है. दूसरा, वैश्विक घटनाएं जैसे ब्याज दरें, भू-राजनीतिक तनाव और व्यापार नीतियां. तीसरा, क्या भारत अपने निर्यात को बढ़ा पाएगा और विदेशी निवेश को आकर्षित कर पाएगा. अगर ये कदम सही दिशा में उठे, तो रुपया स्थिर हो सकता है, वरना दबाव बरकरार रहेगा.



